शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

उन्हें भी वार करना आ गया है...

अदब से सिर झुकाए जो खड़े थे,
उन्हें भी वार करना आ गया है.

समेटो जालिमो दूकान अपनी,
उन्हें व्यापार करना आ गया है.

दिलों में फड़फड़ाती आरज़ू का,
उन्हें इज़हार करना आ गया है.

तुम्हारी बात पर जो मर-मिटे थे,
उन्हें इनकार करना आ गया है.

कि अपने वक़्त पर अपनी जमीं पर,
उन्हें अधिकार करना आ गया है.

(युग तेवर में प्रकाशित)
-वीरेन्द्र वत्स